*आखिर हम लड़ते क्यों है : रियाज़ सिद्दीकी*
*गुफरान खान मिनर्वा न्यूज़*
जहां हिन्दू मुसलमान साथ में हैं वहाँ हिन्दू मुसलमान आपस में लड़ते हैं .
जहां मुसलमान नहीं हैं उस गाँव में हिन्दू आपस में ही लड़ते हैं .
हिन्दू आपस में ही एक दूसरी ज़ात के साथ लड़ते हैं .
सवर्ण और दलित लड़ते हैं जाट और गूजर आपस में लड़ते हैं , अहीर और कुर्मी लड़ते हैं
हिन्दु ही दलितों की बस्तियां जलाते हैं , बच्चों को क़त्ल कर देते हैं .,
दुनिया के जिन देशों में सिर्फ मुसलमान रहते हैं , वहाँ मुसलमान आपस में ही फिरके बना कर एक दूसरे को मार काट रहे हैं .
मस्जिदों में बम फोड रहे हैं , घरों पर , औरतों पर हमले कर रहे हैं ,
शिया सुन्नी और बीसियों फिरके बना कर एक दूसरे फिरके के निर्दोष लोगों को पकड़ कर क़त्ल कर रहे हैं .
असल में ये लड़ना हमने अपने जीने का तरीका बना लिया है .
दूसरे की दौलत और दूसरे की मेहनत पर ही हमारी सारी अमीरी और विकास निर्भर है .
इसलिये गिरोह बना कर दूसरे लोगों के साथ लड़ना हमारे लिये अब ज़रूरी हो गया है .
दूसरे की दौलत पर कब्ज़ा करने के लिये हम गिरोह बनाते हैं .
हमारे सम्प्रदाय असल में हमारी यही गिरोहबंदी है .
हम अमीर बनने के लिये और अमीरी को बनाये रखने के लिये ताकत चाहते हैं .
इसलिये हमें लगता है कि हमारे लिये इस तरह की गिरोहबंदी ज़रूरी है .
ये साम्प्रदायिकता असल में हमारे लालच और ताकत की अंधी भूख का ही नतीजा है .
No comments:
Post a Comment