Friday, 17 September 2021

*सुभाष चंद्र बोस ने किसे कहा था,"भारत का युवा दधिची**मिनर्वा न्यूज़ की खास पहल : इतिहास के पन्नो से*

*सुभाष चंद्र बोस ने किसे कहा था,"भारत का युवा दधिची*

*मिनर्वा न्यूज़ की खास पहल : इतिहास के पन्नो से*

भारत को गुलामी की बेड़ियों से आज़ाद करने में न जाने कितने प्राणों का योगदान था, इसकी गिनती भी नहीं की जा सकती। भारत भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए युवाओं की जो क्रान्ति उठी थी, उसमें एक आवाज़ जतीन्द्रनाथ दास की भी थी। जतीन्द्रनाथ दास, को उनके साथी जतिन दा कहकर पुकारते थे। भगत सिंह की तरह ही जतिन दा भी कम उम्र में ही शहीद हो गए थे। वह छोटी उम्र में ही क्रांतिकारी समूह “अनुशीलन समिति” में शामिल हो गए थे।
27 अक्टूबर 1904 में जन्मे जतीन्द्रनाथ दास, मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। साल 1925 में, अंग्रेजों ने उन्हें ‘दक्षिणेश्वर बम कांड’ और ‘काकोरी कांड’ के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया। हालांकि, सबूत नहीं मिलने के कारण उन पर मुकदमा तो नहीं हुआ, लेकिन वे नजरबन्द कर दिए गए। जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे बुरे व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। जब जतीन्द्रनाथ की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेज सरकार ने डरकर 21 दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया।
भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद, लाहौर षड्यंत्र केस में जतीन्द्रनाथ को भी अन्य लोगों के साथ पकड़ लिया गया। उन दिनों जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों की हालत खराब थी। उनके कपड़े महीनों नहीं धोए जाते थे, तमाम गंदगी में खाना बनता और परोसा जाता था। इसके विरोध में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त आदि ने लाहौर के केन्द्रीय कारागार में भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। फिर सब ने जतीन्द्रनाथ को भी हड़ताल में शामिल होने के लिए कहा, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मैं अनशन तभी करूंगा, जब मुझे कोई इससे पीछे हटने को नहीं कहेगा। मेरे अनशन का अर्थ है, ‘जीत या फिर मौत!’
हड़ताल के 63वें दिन, उनके एक साथी विजय सिंह ने उनका प्रिय गीत “एकला चलो” और “वंदे मातरम” गाया। गीत के खत्म होते ही जतिन दा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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